महिला सशक्तिकरण की वर्तमान स्थिति: राजनैतिक सशक्तिकरण के परिपेक्ष्य में (सिवनी जिले के विशेष संदर्भ में

 

डाॅ. वीरेश कुमार पाण्डेय1, लेखराम डेहरिया2

1प्राध्यापक (अर्थशास्त्र), शास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना (.प्र.)

2शोधार्थी (अर्थशास्त्र), शास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया से हैं जिसमें महिलाओं के लिए सर्वसम्पन्न और विकसित होने हेतु संभावनाओं के द्वारा खुले नए विकल्प तैयार हों। महिलाएँ समाज के लगभग आधे भाग का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमारा समाज मूल रूप से पुरूष प्रधान रहा है। पहले महिलाओं के पास किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता होने के कारण उसकी सामाजिक पारिवारिक स्थिति एक पराश्रित से अधिक नहीं थी। जिसे हर कदम पर एक पुरूष के सहारे की जरूरत होती थी। वैसे तो आजादी के बाद से ही महिला उत्थान के उद्देश्य से विभिन्न प्रयास किये जाते रहें है। लेकिन पिछले कुछ वर्षो में महिला सशक्तिकरण की कार्य में तेजी आयी है। इन्हीं प्रयासों के परिणाम स्वरूप महिलाओं के आत्म विश्वास में बढ़ोत्तरी हुयी है। वे किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए खुद को तैयार करने लगी है। एक ओर जहाॅ केन्द्र राज्यों की सरकारें महिला उत्थान की नई-नई योजनायें बनाने लगीं है। वहीं कई गैर सरकारी संगठन भी उनके अधिकारों के लिये उनकी आवाज बुलन्द करने लगें है। महिला में ऐसी प्रबल भावना को उजागर करने का प्रयास भी किया जा रहा है। कि वह अपने अन्दर छिपी हुई ताकत को सामने लाकर बिना किसी सहारे के आने वाली हर चुनौती का सामना कर सकें। सृष्टि की उत्पत्ति एवं सभ्यता के विकास में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। पुराणों के अनुसार चाहे धर्म की रक्षा हो या उसकी पुर्नस्थापना इन सभी कार्यो को आदि शक्ति माॅ जगदम्बा ने ही पूर्ण किया है। सीता, सावित्री के धर्मपालन को आज भी आदर्श के रूप में समाज में माना जाता है। रानी लक्ष्मीबाई, मदरटेरेसा के वीरता बलिदान तथा सेवा की मिशालें आज भी हमारे जीवन को एक दिशा प्रदान करती है। महिलाए कई रूपों में जीवन व्यतीत करते हुए एक सभ्य एवम् सुसंस्कृत समाज की निर्माण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वह कभी बेटी के रूप में कभी बहन के रूप में तो कभी पत्नी एवम् प्रेमिका के रूप में कभी माॅ के रूप में समाज को विकसित एवं परिमार्जित करने का अथक प्रयास करती रहती है।

 

KEYWORDS:  महिला सशक्तिकरण, महिला उत्थान, राजनीति, सामाजिक समस्याएं।

 

 

प्रस्तावना:-

किसी भी उन्नत राष्ट्र की प्रगति के लिये आवश्यक हैं कि उस राष्ट्र के लोग पुरूष एवं स्त्री दोनों ही शिक्षित हों। प्रायः हमारे देश में यह धारणा है कि शिक्षा का अधिकार एवं उपयोग केवल पुरूषों तक ही सीमित हैं स्त्रियों को केवल कामकाजी महिला एवं बच्चों को जन्म देने वाली मशीन से ज्यादा कुछ नहीं आंका जाता था। परन्तु अब आधुनिक भारत मंे धारणा बदल गयी हैं अब प्रत्येक परिवार की महिला को शिक्षा ग्रहण करने के लिये भी विभिन्न शिक्षालयों में भेजा जाने लगा हैं आधुनिक समय मंे जहाँ शिक्षा के विकास मंे नारी ने कदम रखा वहीं अन्य प्रक्रियाऐं जैसे- औद्योगीकरण, नगरीकरण, पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण, भौतिकवादी विचारधारा एवं आर्थिक स्वतंत्रता आदि ने नारी को परम्पराबद्ध बंधनों से मुक्त करके व्यावसायिक क्षेत्र में ला दिया है, परिणामस्वरूप महिलाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसर खुले हैं तथा महिलायें परम्परागत धारणाओं, मूल्यों एवं मान्यताओं को तोड ़कर श्रम बाजार में अपनी क्षमता एवं योग्यता के आधार पर अपना स्थान निर्धारित कर रही है। आज की आर्थिक कठिनाईयों की वजह से विवाहित महिलाओं द्वारा नौकरी करने से सामाजिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया है अब अधिकांश पति चाहते हैं कि उनकी पत्नियां भी नौकरी करें। वर्तमान की कमरतोड़ मँहगाई और आधुनिकता की दौड़ में कार्यकारी महिलाओं की स्थिति दो नांव में एक साथ पैर रखने के समान है जिसका संतुलन बनाए रखने के लिए महिलायें निरंतर प्रयत्नशील हैं। अतः शिक्षिकाओं के लिए परिवार ओर नौकरी का सही संतुलन जोखिम भरी चुनौती है जिसे उसने हसकर स्वीकारा ओर सफलता के साथ निभा रही हैं ‘‘ऊषा मल्होत्रा के अनुसार ‘‘घर और बाहर का संतुलन आवश्यक है’’ इसमें दो राय नहीं हैं कि वर्तमान भौतिकवादी एवं सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप महिलाओं की स्थिति में काफी परिवर्तन आया हैं इस परिवर्तन में संतुलन बनाए रखने के लिए महिलाओं ने दोहरी भूमिका स्वीकारी हैं चाहे इस दोहरी भूमिका के कारण महिलाओं को किन्हीं भी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता हो, किन्तु फिर भी वह कार्यकारी होना ही पसंद करती हैं, क्योंकि आज सामाजिक जीवन में जो क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं उससे लोगों का जीवन स्त़र बढ़ा है खान-पान, रहन-सहन, पहनावा जीवन शैली बदली है, ओर मानसिक सोच में भी परिवर्तन आया है, आवश्यकताऐं भी बढ़ी हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पुरूष के साथ महिलाओं का कार्यकारी होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

 

शासकीय और अशासकीय संस्थानों में सेवारत विवाहित तथा अविवाहित महिलाएं सम्मिलित हैं। अध्ययन के दौरान इन महिलाओं में शोधार्थी को गहरे कर्तव्य बोध और मातृत्व के दर्शन हुए हैं, अध्ययन में पाया कि कार्यकारी महिलाएं अन्य गृहस्थ महिलाओं से कहीं अधिक अपने शिशुओं के पालन पोषण में सफल एवं समर्थ हैं। इसके साथ ही अपने दायित्वों के निर्वाह में सजग एवं जागरूक दिखाई दीं, जैसे कार्यालय में समय पर उपस्थिति, अपने कार्य को जिम्मेदारीपूर्वक उचित ढ़ंग से निपटाना तथा समय पर घर लौटना आदि। महिल़ाओं का घर से बाहर पुरूषों के समान कार्य करने से उनके पारिवारिक दायित्वों में हुये परिवर्तन एवं शिक्षक तथा गृहिणी की भूमिका के उत्तरदायित्वों के सफलतापूर्वक निर्वाह में महिलाओं को़़़़़़़़़़ होने वाली समस्याओं से अवगत होने के लिए वर्तमान सामाजिक एवं राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महिलाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन महत्वपूर्ण है। महिलाएं घर-परिवार और नौकरी पेशा की दोहरी भूमिका निभाते हुए दोहरी माँगों तनावों के कारण परस्पर पारिवारिक विसंगतियों का सामना कर रही हैं, जिसका प्रभाव उनकी नौकरी से सम्बद्ध दायित्वों कर्तव्यों पर भी पड़ता है।

 

समाज की प्रत्येक आवश्यकताओं को पूरा करने में महिलाएॅ पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती है। समाज में विकास में सहभागिता का जो सम्मान उन्हें प्राप्त होना चाहिए था वह नही मिल पाया है। क्योंकि इस सभ्य समाज में पुरूषवर्ग का वर्चस्व विद्यमान है। पुरूष वर्ग हर क्षेत्र में महिलाओं के सहयोग से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करते है लेकिन जब सम्मान एवं अधिकार की बात आती है तो महिलाएॅ पुरूषों से कहीं पीछे छूट जाती है। महिलाओं को अपने अस्तित्व की बार-बार लड़ाई लड़नी पड़ती है लेकिन यह प्रकृति गवाह है कि जब भी समाज में कोई परिवर्तन या क्रांति हुई है महिलाओं ने उस पर अपना सर्वस्व अर्पण किया है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य तथा नीति-निर्देशक सिद्धांतों में लैंगिक समानता के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। संविधान केवल महिलाओं की समानता को सुनिश्चित करता है, बल्कि राज्यों को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव का निर्देश देता है।

 

लोकतांत्रिक राजनीति के ढांचे में हमारे कानून, विकास नीतियां, योजनाएं तथा कार्यक्रम को विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के उत्थान की ओर उन्मुख रखा गया है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-78) से महिला कल्याण से लेकर विकास तक के मुद्दे को उठाया जा रहा है। हाल के वर्षों में महिला सशक्तीकरण को महिला की दशा का एक केंद्रीय मुद्दा माना गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना वर्ष 1990 में संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई है, जिसके तहत महिला के अधिकारों तथा कानूनी अशिकारों को सुरक्षा प्रदान की जाती है। संविधान का 73वां तथा 74वां संशोधन (1993) में पंचायत तथा नगर निकाय के चुनावों में महिला को आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिससे स्थानीय स्तरों पर उनकी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

पूर्व में किये गये कार्यो की संक्षिप्त समीक्षा

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका विषय पर पूर्व में काफी लेखन कार्य किया गया है जिसमें कई राजनीतिज्ञों एवं समाजशात्रियों ने विवेचनाए की है। जिसमें डाॅ. लक्ष्मीराजी कुलश्रेष्ठ (2001) ने अपने लेख में ‘‘पंचायती राज और महिलाएं में लिखती है कि पंचायतीराज व्यवस्था महिला आरक्षण के परिणामस्वरूप अब महिलाओं की मनः स्थिति बदल रही है। वे अब अपना पक्ष पूरी निर्भीकता तथा निष्पक्षता से बैठक में रखने लगी है। बहरहाल पंचायतीराज व्यवस्था में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से उन्हें जो नया परिवेश मिल रहा है। वह उनके लिये प्रगति और विकास के द्वार तो खोल रहा है। पुरूष तथा स्त्री के बीच समाज में जो सामाजिक विषमता है, उसमें भी कमी हो रही है। भारतडोगरा (2001) अपने लेख ‘‘सार्थक है महिलाओं का आरक्षण’’ में निर्वाचित महिलाओं पर पारिवारिक दबाव से उत्पन्न तनावों के बारे में लिखते हैं कि राजनीतिक महत्वकांक्षा वाले पुरूष अपने परिवार की महिलाओं को अपनी निजी महत्वकांक्षा की दौड़ का साधन या मुखौटा मात्र बनाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि आरक्षण का लाभ उठाकर उनके परिवार की महिला निर्वाचित हो, पर इसके आगे वे यह भी चाहते हैं निर्वाचित होने के बाद वे उनके दबदबे में उनके कहे अनुसार काम करें। सुधापिल्लै (2002) ने ‘‘पंचायतीराज द्वारा अधिकार संपन्नता’’ में लिखती हैं कि संविधान के 73वें संशोधन से लगभग 10 लाख महिलायें त्रि-स्तरीय ढ़ांचे में सदस्य और अध्यक्ष पदों पर कार्यरत है। निश्चित ही इससे हाल तक ठहरें ग्रामीण समाज में बदलाव आया है। महिला आरक्षण की राजनीति शीर्षक में राजनाथ सिंह सूर्य ने स्पष्ट किया कि सभी राजनीति दल महिला आरक्षण पर राजनीति कर रहे हैं। पंचायतों की तरह विधानसभा तथा लोकसभा में पिछड़े वर्ग की महिला तथा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी मुस्लिम सांसदों ने पहली बार आरक्षण की मांग की।

 

उद्देश्य:-

प्रस्तुत शोध पत्र में महिलाओं के शिक्षा के निम्न उद्देश्य है:-

     सिवनी जिले के संदर्भ में महिलाओं के सशक्तिकरण की यथार्थ स्थिति का पता लगाना।

     अध्ययन में सम्मिलित महिलाओं के जीवन की स्थितियों तथा समस्याओं के बारे में पता लगाना।

     राजनैतिक सशक्तिकरण के उपादान के रूप में पंचायतीराज व्यवस्था में उनकी सहभागिता का स्वरूप, सहभागिता के स्तर की वास्तविक स्थिति का विश्लेषणात्मक विवेचना करना।

     शोध क्षेत्र की महिलाओं के राजनैतिक जीवन पर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के प्रभावों का अध्ययन करना।

     राजनीति, महिलाओं को सशक्त बनाने का सबसे शक्तिशाली उपाय है प्रत्येक महिला को शिक्षित करना।

     ज्ञान का प्रसार कर महिलाओं को राजनैतिक क्षेत्र में सशक्त बनाना।

     मानवीय मूल्यों का निर्माण और विकास-अंधविश्वास, कुरीतियों को समाप्त कर नई परंपरा विकसित करना।

     शिक्षा द्वारा ज्ञान प्राप्त कर महिलायें सशक्त होंगी और स्वस्थ्य समाज एवं देश की प्रगति में सहायक होंगी।

 

उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति शिक्षा के द्वारा महिलाए स्वयं को राजनैतिक स्तर पर सशक्त बना सकती है। इस तथ्य को स्पष्ट करने का प्रयत्न इस शोध पत्र के माध्यम से किया गया है।

 

शोध परिकल्पनाएँ:-

परिकल्पना सामाजिक अनुसंधान की प्रथम सीढी़ है। उपकल्पना से तात्पर्य अनुसन्धानकर्ता द्वारा अध्ययन कार्य के पूर्व बारे में जो काल्पनिक, पूर्वानुमान, विचार किया जाता है, उसे ही उपकल्पना कहते हैं। ये उपकल्पना तथ्यों को एकत्रित करने में सहायक होती है। अर्थात अनुसंधान कार्य प्रारंभ करने के पूर्व अनुसंधान के कारणों समस्याआंे के समाधान एवं परिणाम के बारे में हम जो एक निश्चित आवधारणा बना लेते हैं उसे परिकल्पना या उपकल्पना कहते है।

1.    राजनीति के क्षेत्र में आने से महिलाओं के समाजिक संरचना एवं समाज में बदलाव आया है।

2.    महिलाओं के राजनीति में आने के कारण अस्पृश्यता का अन्त हुआ है।

 

भारत में सैद्धान्तिक रूप से आज, आदि और हमेशा से ही नारी की मर्यादा है कहा जाता है कि समाज में नारी का स्थान पुरूष के समान ही है कम और अधिक प्राचीन काल से आज तक महिलाओं की राजनीतिक सामाजिक स्थिति में काफी उतार चढ़ाव आए हैं आधी दुनिया को प्रतिष्ठा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। तो कभी उन्हे दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था। आजादी से पूर्व भारत मंे महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नही थी। ब्रिटिश शासकों के जाने के पश्चात जब भारतवासियों को आजादी मिली तो हमारे नीति को आजादी मिली तो हमारे नीति निर्धारकों ने महिलाओ की सामाजिक, राज नीतिक एवं आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए प्रयास करने प्रारम्भ कर दिए, क्योंकि आधी दुनिया के विकास की दौड़ में पीछे रह जाने पर कोई भी राष्ट्र अपने समग्र विकास का दावा नहीं कर सकता फलस्वरूप आजादी के बाद शुरू हुआ महिला सशक्तिकरण का आन्दोलन आज भी जारी है। इस दौरान इसे कुछ असफलताए मिलीं तो इसके खाते मंे बहुत सी सफलताए भी दर्ज हैं सरकार ने वर्ष 2001 में महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया है। जिसका उद्देश्य महिला अधिकारों और उससे संबंधित मुद्दो के बारे में व्यापक जागरूकता लाना है। आज भी नारी सशक्तिकरण का नारा चारो ओर ध्वनित हो रहा है इसके पीछे यह भावना निहित है कि नारी को शक्ति सम्पन्न बनाना उसको अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। आज उसकी सोच का दायरा विस्तृत होता जा रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में वह सफलता चाहती है। महिला सशक्तिकरण के इस दौर में महिला, पुरूष जाति की सोच में परिवर्तन को ढूढ रही है। सशक्तिकरण एवं शिक्षा के बीच संबंध महिला का विकास शिक्षित होने में ही निहित है। तभी वह आर्थिक तौर पर सशक्त बन सकेगी।

 

आधुनिकता की ओर अग्रसर करने में भी शिक्षा सहयोगी है। शिक्षा के द्वारा ही महिलाएँ प्राचीन समय की अच्छाइयों बुराइयों से लेकर नये समाज से संबंधित कुरीतियों, अंधविश्वास से हट कर नये समाज के निर्माण में सहयोग दे रही है, यही कारण है कि आज की नारी पुरानी परंपराओं से दूर होती जा रही है। आज गांवों में भी आधुनिकता दिखाई पड़ रही है। जिसके प्रभाव के कारण आज महिलाएॅं स्कूल, काॅलेज, बैंक, अस्पताल, आफिस में स्वयं जाकर अपना कार्य कर रही है और आत्मनिर्भर होती जा रही है।

 

महिलाओं की राजनीतिक स्थिति को आज समाज की स्थिति के विकास के एक निर्धारक के रूप में स्वीकार किया जाता है। क्योंकि महिलाएं प्रत्यक्षतः तथा अप्रत्यक्षतः राजनीतिक क्रियाओं में योगदान देती है। वह समस्त पारिवारिक दायित्वों को बोझ उठाकर पुरूषों को केवल राजनीतिक क्रियाएं सम्पादित करने का पूरा समय अवसर प्रदान करती हैं अथवा स्वयः भी पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ पुरूषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर राजनीतिक क्रियाओं में संलग्न होती है। आज भागीदारी की दृष्टि से कृषि, पशु व्यवसाय, हैण्डलूम आदि में महिलाओं के अनुपात में काफी सीमा तक वृद्धि हुई है। पिछले दशक में महिलाओं की क्रियाओं से सम्बन्धित नये आयाम उभरकर सामने आये है। अब महिलायें इलेक्ट्रानिक्स, टेली कम्यूनिकेशन, उपभोक्ता उत्पादन, संगठित क्षेत्र के उद्योग, विधि, चिकित्सा, प्रशासनिक तथा अन्य महत्वपूर्ण व्यवसायी में भाग ले रही है। महिलाओं के लिए कार्य शब्द का कोई अर्थ, परिभाषा सीमा निर्धारित नहीं है। यद्यपि महिलाएॅ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में 60-80 प्रतिशत तक योगदान देती हैं तथापि उनकी बहुत सारी क्रियाओं को सकल राष्ट्रीय उत्पादन में सम्मलित नही किया जाता है। अनुमानों के आधार पर महिलाओं की अभुगतानिक श्रम की नकद वार्षिक कीमत लगभग 4 ट्रिलियन डाॅलर होती है जो विश्व के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक तिहाई भाग है। अर्थव्यवस्था में महिलाओं की आर्थिक क्रियाओं में संलग्नता विकास की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

 

वर्गीकरण एवं विश्लेशण-

तथ्य संकलन के लिए उद्देश्यपूर्ण निदर्शन पद्धति का चयन कर समस्त में से 50 उत्तरदातों/इकाइयों का चयन किया गया है। तथा उनसे प्राप्त उत्तरों को सांख्यिकी द्वारा विश्लेशण किया गया है। महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण कई क्षेत्र प्रभावित हुए है प्रभावित क्षेत्रों का विवरण निम्नानुसार है-

 

 

तालिका क्र0 1 महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण प्रभावित क्षेत्र

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तलिका क्र0 1 में स्पष्ट किया गया है कि समाज में महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण का प्रभाव मुख्यतः सभी क्षेत्रों में पड़ा है। चिकित्सा के क्षेत्र में 20 प्रतिशत आधुनिकीकरण का प्रभाव पड़ा है। प्राचीन समय में स्वास्थ्य केन्द्रों में हस्तलिखित पंजीयन पर्ची मिलती थी, दवाओं तथा डाॅ डाक्टरों से सीधा संवाद और बीमारियों का इलाज होता था, लेकिन महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण के कारण आॅनलाइन पंजीयन पर्ची, तथा एक्सरे-मशीन, सोनोग्राफी द्वारा बीमारियों का पता लगा लिया जाता है। महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण स्वास्थ्य केन्द्रों में पारदर्शिता गई है। शिक्षा के क्षेत्र में भी 20 प्रतिशत प्रभाव पड़ा है।

 

 

 

तालिका क्र0 2 महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से समाज में होने वाले परिवर्तन

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महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से समाज में कई परिवर्तन हुए हैं जिनका विश्लेषण निम्नानुसार है-

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से समाज में कई परिवर्तन हुए हैं। परम्परागत सामाजिक संरचना में 10 प्रतिशत परिवर्तन हुए हैं परम्परागत सामाजिक संरचना के स्थान पर नवीन सामाजिक संरचना का निर्माण महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण के कारण ही संभव हुआ है।

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से सामाजिक संगठन में 10 प्रतिशत परिवर्तन हुए हैं। भौतिक जगत में महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से ही परिवर्तन संभव हुआ है। समाज के भौतिक जगत में जो परिवर्तन हुए है, वे महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से हुआ है। समाज शांत समाज या सरल समाज के प्रभाव से हुआ है। महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से समाज भी नगरीय समाज की तरह ही धीरे-धीरे विकसित हो रहा है।

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से परिवार में भी परिवर्तन हुआ है। समाज में मुखतः संयुक्त परिवार होते है। लेकिन महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से ग्रामीण परिवार का आकार लघु हो गया है।

 

समाज में सामाजिक संबंध प्राथमिकता आमने-सामने के होते है। इनमें हम की भावना पायी जाती है, लेकिन महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण से सामाजिक संबंधों में परिवर्तन गया है। प्राथमिक संबंधों के स्थान पर द्वितीयक तथा अप्रत्यक्ष संबंध बनते जा रहे है इसके कारण हम के स्थान पर व्यक्तिवादिता की भावना का जन्म हुआ है।

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण परिणाम

समाज का अध्ययन करने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सामाजिक परिवर्तन की गति निरन्तर है, जिसके कारण महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण क्या परिणाम होते हैं। समाज की किन-किन परिस्थितियां विभिन्न सामाजिक परिणामों को प्रोत्साहित करती है। फिर भी महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण कुछ सामान्य परिणाम होते हैं जो सभी समाजो में पाये जाते हैं जिनका अध्ययन सारणीयन और विश्लेषण निम्नानुसार है-

 

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महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण प्रमुख सामाजिक परिणाम निम्न है-

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण समाज से परम्परागत आधार टूट चुके है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से 20 प्रतिशत वृहद समाजों का जन्म हुआ है।

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण जहां एक ओर परम्परागत प्रदत्त पदो ंके महत्व में कमी होती है वहीं दूसरी ओर अर्जित पदों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी है। आधुनिकीकरण प्राथमिक समूहों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। उसके कारण उनका संगठन शिथिल हो जाता है। प्राथमिक सम्बन्ध छूटते जाते है जिसकें फलस्वरूप द्वितीय संगठनों 20 प्रतिशत का निर्माण हुआ है।

 

तालिका क्र0 4 महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण आर्थिक परिणाम

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महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण आर्थिक क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। इस प्रकार आर्थिक परिणाम निम्नलिखित हैं-

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण समाज में भी औद्योगिक इकाइयों का महत्व बढ़ता जा रहा है। परम्परागत उद्योगों के प्रति उपेक्षात्मक दृष्टिकोण विकसित हो गया है। गृह-उद्योग समाप्त होते जा रहें है और उनके स्थान पर नवीन औद्योगिक संरचना का विकास हो गया है।

 

नगरीकरण ही आधुनिकीकरण का दूसरा परिणाम है। शिक्षा, उद्योग आवागमन और सन्देशवाहन के साधनों में वृद्धि के कारण नगरीकरण का विकास होता जा रहा है। विशेषीकरण आधुनिक औद्योगिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। औद्योगिक श्रमिकों को विशेष प्रकार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। और इस प्रशिक्षण के अनुसार उन्हें कार्य दिये जाते है। जो जिस कार्य का विशेषज्ञ होता था उसे वही कार्य सौपा जाता है ताकि उस कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम दे सकें।

 

तालिका क्र0 5 महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण राजनीतिक परिणाम

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समाज में महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रभाव पड़ा है। महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण राजनीतिक परिणामों को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया गया है-

 

महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण समाज का परम्परागत राजनीतिक ढाँचा ही बदल गया हो। जमीदारी समाप्त हो गयी है अब समाज में भी पूर्णतः प्रजातांत्रिक/लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित है। पहले समाज में कानून व्यवस्था गाॅव के मुखिया और पंचो के हाथ में थी लेकिन महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण यह व्यवस्था समाप्त हो गयी है। अब कानून व्यवस्था पुलिस और न्यायालय के हाथों में गई है। प्राचीन समय में समाज परम्परागत समाज की परम्पराओं का विशेष महत्व, प्रथा थी, लेकिन महिलाओं का राजनीति में प्रवेश के कारण इस स्वरूप व्यवस्था के रूप में बदलाव गया है।

 

सुझाव:-

भारत के संदर्भ में यदि देखें तो महिलाओं की स्थिति अत्यन्त सोचनीय है उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं:-

     सर्वप्रथम महिलाओं के राजनीतिक स्थिति में सुधार के लिए प्रयास करने होगे। महिला संगठनों, स्वयं सेवी संस्थाओं को इस दिशा में प्रयास करने होगे।

     महिलाओं को इनके कानूनी अधिकार की जानकारी, महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये निर्देशों का सख्ती से पालन, शोषण, उत्पीड़न सम्बन्धी मामलों का जल्द निराकरण, महिला मामलों में पुलिस की पूरी सजगता एवं सक्रियता, महिलाओं के लिए पृथक महिला थानों की स्थापना आदि महिलाओं का शोषण रोकने के लिए आवश्यक है।

     वर्तमान समय में लागू महिला सम्बन्धी कानूनों में व्याप्त विसंगतियों को दूर करना जिससे महिलाओं को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों में पुरूषों के समान कानूनी और व्यावहारिक रूप मंे सभी मानवाधिकार हासिल हों।

     महिलाओं को अपनी मानसिक प्रवृत्ति में परिवर्तन लाना होगा जिससे उनमें आत्म विश्वास में वृद्धि होगी।

 

उपसंहार

महिला समाज की धुरी है अगर धुरी टूट गई तो समाज भी टूट जायेगा। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने महिलाओ को गुलाम बनाया वे खुद गुलाम बन गये, जिन समाजों ने महिलाओं को प्रगति का मौका दिया उन्हें सभ्यता के शिखर पर पहुंचने से कोई नही रोक सका। यद्यपि महिलाएँ तेजी से राजनीति के क्षेत्र में रही है, तथापि उन्हें राजनीति में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अशिक्षा, भ्रष्टाचार, शोषण, आर्थिकपराधीनता, राजनीतिक सोच का आभाव आदि ऐसी प्रमुख बाधाएं है जो राजनीतिक क्षेत्र में आगे बढ़ने में रूकावट लाती है।

 

महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिये उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाना होगा। अध्ययन क्षेत्र की महिलाओं में व्याप्त अशिक्षा और अंधविश्वास को दूर कर उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने का दायित्व है। भ्रष्टाचार और शोषण से महिलाओं को मुक्त करके उन्हें राजनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ाया जा सकता है।

 

महिलाओं में राजनीतिक जागरण की आवश्यकता है। राजनीति जागरण से मेरा तात्पर्य उनका शिक्षित और संस्कारित होना आवश्यक है अतः भारतीय परिवार में नारी का सर्वप्रथम दायित्व पत्नीत्व और मातृत्व के साथ राजनैतिक कार्यकलाप का समन्वय होना अतिआवश्यक है। एक सफल माँ और पत्नी की समाज और देश को सफल नेतृत्व दे सकती है।

आज पश्चिमी अपसंस्कृति के बहाव में भारतीय नारी अपनी अस्मिता को खोती जा रही है, जो हमारे देश के राजनीति का एक घातक तत्व साबित हो रहा है। अतः भारतीय प्राचीन संस्कृति की अवधारणाओं में नारीत्व का परिवेश आज की नारियों को समझना होगा तभी उनका राजनीति में नेतृत्व का पैमाना सफल साबित होगा।

 

निष्कर्षतः

महिलाएं समाज का अनिवार्य अंग है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्षेत्र के साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में उनकी अहम भूमिका है। जैसे-जैसे शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं में राजनीति जागरूकता रही है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार और बदलते सामाजिक परिवेश में राजनीति में महिलाएँ आगे रही है और केन्द्रीय, प्रान्तीय, स्थानीय शासन में अपनी भागीदारी निभा रही है। इसलिये महिलाअंो को सशक्त और सुदृढ़ बनाने पर ही समाज सुदृढ़ होगा। महिलाओं को सुदृढ़ करने के लिये उनका शिक्षित होना आवश्यक है ताकि अपने अधिकारों को समझ कर समाज एवं राष्ट्र का विकास कर सके।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची -

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Received on 05.10.2020            Modified on 29.10.2020

Accepted on 19.11.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(3):153-160.